अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख़ और वैदिक कैलेंडर की तिथि, दोनों अलग चीज़ें हैं।

तिथि कैसे बनती है

तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच के कोणीय अंतर (देशांतर) से तय होती है। हर 12 डिग्री के अंतर पर एक नई तिथि शुरू होती है, कुल 30 तिथियाँ एक चंद्र महीने में होती हैं।

शुक्ल और कृष्ण पक्ष

महीने के पहले 15 तिथियाँ शुक्ल पक्ष (चंद्रमा बढ़ता हुआ) कहलाती हैं, अगली 15 कृष्ण पक्ष (चंद्रमा घटता हुआ)। पूर्णिमा और अमावस्या इन दोनों पक्षों की आख़िरी तिथियाँ हैं।

शुभ कार्यों में तिथि का महत्व

कुछ तिथियाँ शुभ कार्यों के लिए बेहतर मानी जाती हैं, जैसे विवाह या गृह प्रवेश के लिए पंचांग में तिथि सबसे पहले देखी जाती है। कुछ तिथियां रिक्ता कहलाती हैं, जैसे चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी, इन्हें नई शुरुआत के लिए कमज़ोर माना जाता है। वहीं द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी को नंदा, भद्रा, जया, पूर्णा आदि नामों से पुकारा जाता है, हर श्रेणी का अपना स्वभाव माना जाता है।

तिथि क्षय और तिथि वृद्धि

चूंकि चंद्रमा की गति हमेशा एक-सी नहीं होती, कभी-कभी एक तिथि सूर्योदय से सूर्योदय के बीच पूरी तरह समा नहीं पाती, इसे तिथि क्षय कहते हैं, और कभी-कभी एक तिथि दो सूर्योदय तक फैल जाती है, इसे तिथि वृद्धि कहते हैं। यही वजह है कि कभी-कभी अलग-अलग पंचांग या ऐप्स एक ही त्योहार की तारीख अलग-अलग बताते नज़र आते हैं, यह गलती नहीं बल्कि गणना पद्धति का सूक्ष्म अंतर है।

आज की तिथि देखें

पंचांग टूल पर आज की तिथि, पक्ष सहित तुरंत देखें।